स्थितिज ऊर्जा की अभिधारणा किसे कहते हैं | प्रकार, सूत्र, उदाहरण

स्थितिज ऊर्जा

साधारणतः किसी वस्तु में उसकी स्थिति के कारण उत्पन्न ऊर्जा को उस वस्तु की स्थितिज ऊर्जा (potential energy in Hindi) कहते हैं। इसे U द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
स्थितिज ऊर्जा एक अदिश राशि है। अर्थात इसमें केवल वस्तु का परिमाण होता है वस्तु की दिशा का कोई संबंध नहीं होता है। विराम की अवस्था में रखी वस्तुओं में स्थितिज ऊर्जा विद्यमान होती है जैसे मेज पर रखी किताब। चूंकि मेज द्वारा किताब पर उतना ही बल लगाया जाता है जो उसके भार को संतुलित करने में पर्याप्त हो।

स्थितिज ऊर्जा के प्रकार

स्थितिज ऊर्जा निम्न प्रकार की होती है।
(1) गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा
(2) प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा
(3) विद्युत स्थितिज ऊर्जा

1. गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा

किसी वस्तु में उसकी पृथ्वी तल से ऊंचाई के कारण कार्य करने की क्षमता को उस वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहते हैं।
माना m द्रव्यमान की एक वस्तु, पृथ्वी तल से h ऊंचाई पर है इसके लिए गुरुत्वीय बल F के विरुद्ध किए गए कार्य को स्थितिज ऊर्जा कहते हैं। तब
स्थितिज ऊर्जा U = वस्तु का भार(mg) × ऊंचाई(h)
\footnotesize \boxed { U = mgh }
अतः वस्तु का द्रव्यमान और ऊंचाई जितनी अधिक होगी उसकी स्थितिज ऊर्जा का मान भी उतना ही अधिक होगा।

2. प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा

किसी वस्तु में उसके वास्तविक आकार में परिवर्तन के कारण जो कार्य करने की क्षमता होती है उसे प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा कहती हैं। इसके सबसे अच्छे उदाहरण रबड़ व स्प्रिंग को माना जाता है।
जब किसी प्रत्यास्थ वस्तु को खींचा जाता है तो वस्तु पर एक प्रत्यानयन बल कार्य करता है जो वस्तु को सामान्य अवस्था में लाने का प्रयास करता है। इस बल के कारण ही वस्तु में कार्य करने की क्षमता निहित रहती है।
एक आदर्श स्प्रिंग की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा
\footnotesize \boxed { U = \frac{1}{2}kx^2 }
जहां x विस्थापन एवं k स्प्रिंग नियतांक है।

3. विद्युत स्थितिज ऊर्जा

दो आवेश एक दूसरे पर आकर्षण तथा प्रतिकर्षण का बल लगाते हैं। आवेशों में उनकी स्थिति के कारण उनमें संचित ऊर्जा को ही विद्युत स्थितिज ऊर्जा कहते हैं।

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स्थितिज ऊर्जा के उदाहरण

  1. स्थितिज ऊर्जा को उदाहरण द्वारा आसानी से समझा जा सकता है इसके कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं-किसी ऊंचाई पर रखें पिंड में उसकी स्थिति के कारण स्थितिज ऊर्जा विद्यमान होती है।
    जब हम दो पत्थरों को अलग-अलग ऊंचाई से नीचे की ओर फेंकते हैं तो जिस पत्थर की ऊंचाई अधिक होगी उसकी स्थितिज ऊर्जा भी उतनी ही अधिक होगी।
स्थितिज ऊर्जा की अभिधारणा किसे कहते हैं

चित्र में h2 पत्थर की ऊंचाई अधिक है इसलिए h2 ऊंचाई वाले पत्थर की स्थितिज ऊर्जा अधिक होगी। ऊंचाई के साथ स्थितिज ऊर्जा द्रव्यमान पर भी निर्भर करती है।

  1. किसी धनुष में उसकी स्थिति परिवर्तन के कारण इसमें स्थितिज ऊर्जा विद्यमान होती है।
    जब धनुष से बाण छोड़ा जाता है तो बाण को जितनी अधिक दूरी तक खींचा जाता है तो बाण उतनी ही अधिक दूरी तक पहुंचता है। धनुष में बाण को जितना अधिक खींचा जाता है तो उसकी स्थितिज ऊर्जा उतनी ही अधिक हो जाती है फलस्वरुप बाण अधिक दूरी प्राप्त करता है।
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