प्रोटीन क्या है, प्रकार, परिभाषा, स्रोत, संरचना, विकृतिकरण किसे कहते हैं, क्रियाविधि

प्रोटीन

प्रोटीन शरीर का निर्माण करते हैं। यह उच्च अणुभार वाले जटिल कार्बनिक यौगिक हैं। यह जीवित प्राणियों के लिए आवश्यक है। प्रोटीन कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन तथा नाइट्रोजन के यौगिकों से बने होते हैं। कुछ प्रोटीन फास्फोरस तथा सल्फर में भी पाए जाते हैं यह वनस्पतियों तथा जंतुओं में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। प्रोटीन, ऐमीनो अम्ल के बहुलक होते हैं। प्रोटीन के मुख्य स्रोत दूध, दही, दालें, मटर, मछली, पनीर, मांस, मूंगफली, अंडा आदि हैं।

प्रोटीन के प्रकार

आण्विक संरचना के आधार पर प्रोटीन को दो भागों में बांटा गया है।
1. रेशेदार प्रोटीन (fibrous protein in Hindi)
2. गोलिकाकार प्रोटीन (globular protein in Hindi)

1. रेशेदार प्रोटीन

वह प्रोटीन जिसमें पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएं फाइबर (रेशे जैसी) संरचना का निर्माण करती हैं। तथा पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएं समांतर होती हैं एवं यह आपस में हाइड्रोजन बंध द्वारा जुड़ी रहती हैं। अर्थात् इनमें अंतराअणुक बल प्रबल होता है। रेशेदार प्रोटीन जल में अविलेय होते हैं।
उदाहरण – बाल, नाखून में उपस्थित किरेटिन तथा मांसपेशियों में उपस्थित मायोसिन एवं रेशम में उपस्थित फाइब्रॉइन आदि रेशेदार प्रोटीन के सामान्य उदाहरण हैं।

2. गोलिकाकार प्रोटीन

वह प्रोटीन जिनमें पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएं इस प्रकार व्यवस्थित होती है कि वे प्रोटीन अणु को एक गोल आकृति प्रदान करती हैं। गोलिकाकार प्रोटीन के अणु के मध्य दुर्बल अंतराअणुक बल होता है। जिस कारण यह प्रोटीन जल में विलेय होते हैं।
उदाहरण – हार्मोंस (इंसुलिन तथा थायरोग्लोव्युलिन) एंटिवाडीज, हिमोग्लोबिन, एल्ब्यूमिन आदि गोलिकाकार प्रोटीन के सामान्य उदाहरण हैं।

प्रोटीन का महत्व

प्रोटीन हमारे शरीर की वृद्धि के लिए एक आवश्यक अवयव है। जब हम बीमार होते हैं तो कोशिकाओं और ऊतकों में सुधार के लिए शरीर को ऐमीनो अम्ल की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि यह तो हम जानते ही हैं कि आवश्यक ऐमीनो अम्ल का संश्लेषण शरीर द्वारा नहीं होता है। अतः इन्हें हमें भोजन में प्रोटीन के रूप में लेना पड़ता है। प्रोटीन रक्त के pH को भी नियंत्रण बनाए रखता हैं।

प्रोटीन के कार्य

  1. प्रोटीन शरीर की संरचना एवं वृद्धि में मुख्य भाग लेते हैं।
  2. हार्मोन तथा एंजाइम का संश्लेषण प्रोटीन द्वारा होता है।
  3. प्रोटीन रक्त के pH पर नियंत्रण रखता है।
  4. प्रतिरक्षी प्रोटीन शरीर की सुरक्षा में प्रयुक्त होता है।

प्रोटीन का विकृतिकरण

जब प्राकृतिक प्रोटीन के भौतिक गुण जैसे– ताप तथा रासायनिक गुण जैसे– pH आदि। में परिवर्तन किया जाता है तो प्रोटीन के भौतिक एवं जैविक गुणों में भी परिवर्तन हो जाता है। अर्थात् प्रोटीन अपनी दैनिक सक्रियता को खो देता है। इस प्रकार प्राप्त प्रोटीन को विकृतिकृत प्रोटीन तथा इस प्रक्रिया को प्रोटीन का विकृतिकरण कहते हैं। इस प्रक्रिया में प्रोटीन के भौतिक एवं जैविक गुणों में उसके रसायनिक संगठन को प्रभावित किए बिना ही परिवर्तन हो जाता है।

प्रोटीन का परीक्षण

  1. प्रोटीन को सांद्र नाइट्रिक अम्ल HNO3 के साथ गर्म करने पर यह पीला रंग देती है। इसे जैंथोप्रोटिक परीक्षण कहते हैं।
  2. पेप्टाइड बंध युक्त यौगिक (प्रोटीन) में कॉपर सल्फेट का तनु विलयन डालने पर यह लाल अथवा बैगनी रंग उत्पन्न करता है।

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