उपसहसंयोजक यौगिकों का वर्नर सिद्धांत के गुण, प्राथमिक तथा द्वितीयक संयोजकता के उदाहरण, सीमाएं

उपसहसंयोजक यौगिकों का वर्नर सिद्धांत

उपसहसंयोजक यौगिकों की संरचनाओं के संबंध में वैज्ञानिक अल्फ्रेड वर्नर ने एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसे उपसहसंयोजक यौगिकों का वर्नर सिद्धांत (werner’s theory of co-ordination compound in Hindi) कहते हैं।
इस सिद्धांत की कुछ प्रमुख अवधारणाएं निम्न प्रकार से हैं।

1. उपसहसंयोजक यौगिकों में धातुएं, दो प्रकार की संयोजकता प्रदर्शित करते हैं।
(a) प्राथमिक संयोजकता
द्वितीयक संयोजकता
(a) प्राथमिक संयोजकता – प्राथमिक संयोजकता सामान्य रूप से आयनिक होती है तथा यह ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती है। इसका मान प्रत्येक धातु के लिए निश्चित नहीं होता है। प्राथमिक संयोजकता को रेखाओं (डॉट लाइन ……..) द्वारा प्रदर्शित करते हैं।
(b) द्वितीयक संयोजकता – द्वितीयक संयोजकता आयनिक नहीं होती हैं। तथा यह उदासीन अणुओं अथवा ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती है। इसका मान प्रत्येक धातु के लिए निश्चित होता है। द्वितीयक संयोजकता, संकुल यौगिकों में धातु की उपसहसंयोजन संख्या को दर्शाती है। इसे सीधी लाइनों (-) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

2. केंद्रीय धातु (परमाणु अणु या आयन) में अपनी प्राथमिक तथा द्वितीयक संयोजकता को संतुष्ट करने की प्रवृत्ति होती है। प्राथमिक संयोजकता ऋणायनों द्वारा संतुष्ट होती है जबकि द्वितीयक संयोजकता उदासीन अणुओं अथवा ऋणायनों द्वारा संतुष्ट होती है।

3. प्राथमिक संयोजकता उपसहसंयोजन परिसर के बाहर होती है जबकि द्वितीयक संयोजकता उपसहसंयोजन परिसर के अंदर होती है।

वर्नर सिद्धांत की सीमाएं

संकुल यौगिकों का कुछ निश्चित धातु ही निर्माण करती हैं सभी अन्य धातु में संकुल यौगिकों का निर्माण नहीं करती हैं।
वर्नर सिद्धांत संकुल यौगिकों में चुंबकीय तथा प्रकाशित गुण के बारे में व्याख्या नहीं कर सका।
संकुल यौगिकों की ज्यामिति निश्चित होती है इसका उत्तर देने में यह सिद्धांत असमर्थ रहा।

उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचनाएं

ल्यूटियों कोबाल्टिक क्लोराइड (CoCl3•6NH3)

इस संकुल यौगिक में कोबाल्ट की ऑक्सीकरण अवस्था +3 होती है यह नारंगी-पीले रंग का क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ होता है। इसकी प्राथमिक संयोजकता तीन होती है। कोबाल्ट की उपसहसंयोजन संख्या 6 है। अतः इसकी द्वितीयक संयोजकता 6 होगी। तब इस प्रकार 6 NH3 अणु कोबाल्ट से द्वितीयक संयोजकता द्वारा जुड़ने चाहिए। तब वर्नर सिद्धांत के आधार पर संकुल यौगिकों की संरचना निम्न प्रकार होगी।

वर्नर सिद्धांत
वर्नर सिद्धांत
द्विक लवण तथा संकुल में अंतर

जो यौगिक जल में अपने आयनों में वियोजित हो जाते हैं। उन्हें द्विक लवण कहते हैं। जबकि जो यौगिक जल में अपने आयनों में वियोजित नहीं होते हैं उन्हें संकुल कहते हैं।
KCl द्विक लवण का एक उदाहरण है जबकि K4[Fe(CN)6] एक संकुल यौगिक का उदाहरण है।


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